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माँ – Maa.n/Mother [Poems] [Tribute]

गुलज़ार साब के जन्मदिन पर प्रस्तुत है उनकी एक अनूठी पर्सनल नज़्म जो उन्होनें अपनी माँ को समर्पित की है! तुझे पहचानूंगा कैसे? तुझे देखा ही नहीं ढूँढा करता हूं तुम्हें अपने चेहरे में ही कहीं लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं यूं तो लबरेज़ हैं पानी से मगर प्यासी हैं कान में छेद है पैदायशी आया होगा तूने मन्नत के लिये कान छिदाया होगा सामने दाँतों का वक़्फा है तेरे भी होगा एक चक्कर तेरे पाँव के तले भी होगा जाने किस जल्दी में थी जन्म दिया, दौड़ गयी क्या खुदा देख लिया था कि मुझे छोड़ गयी मेल के देखता हूं मिल ही जाए तुझसी कहीं तेरे बिन ओपरी लगती है मुझे सारी जमीं तुझे पहचानूंगा कैसे? तुझे देखा ही नहीं Tujhe pahchaanunga kaise Tujhe dekha hi nahi.n dhoondha karata hoon tumhe.n apne chehare me hi kahi.n Log kahate hai.n meri aankhe.n meri Maa.n si hai yoo.n to labrez hai.n paani se magar pyaasi hai.n Kaan me.n chhed hai paidaayashi aaya hoga tune mannat ke liye kaan chhidaaya hoga Saamne daanto.n ka waqfa hai tere bhi hoga ek chakkar tere paanv ke tale bhi hoga Jaane kis zaldi me.n thi janm diya, dauD gayi kya khuda dekh liya tha ki mujhe chhod gayi Mel ke dekhta hoo.n mil hi jaaye tujhsi kahi.n tere bin Opari lagti hai mujhe saari zamee.n Tujhe pahchaanunga kaise Tujhe...

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‘Kaali Aandhi’ se Pahle ‘Aandhi’ [‘काली आंधी’ से पहले ‘आंधी]

The ‘Aha! Zindagi’ special annual edition 2006 features a comprehensive interview of gulzar saab.  An interesting anecdote on aandhi in the same article is posted below where he says that ‘Aandhi’ was not based on Kamaleshwar ji’s novel ‘Kaali Aandhi’, infact the novel was planned during the discussions on the script of aandhi.. Here is the devnagari script of the anecdote   ‘काली आंधी’ से पहले ‘आंधी’… मैं बहुत विस्तार से बताना चाहूंगा… ‘काली आंधी’ वाज़ रिटन आफ्टर ‘आंधी’ एन्ड नाट बिफोर ‘आंधी’.. ‘आंधी’ वाज़ नाट बेस्ड आन काली आंधी… काली आंधी वाज़ बेस्ड आन आंधी । कमलेश्वर जी हमारे साथ थे, हम एक फिल्म के लिये चेन्नई गये थे। ढूंढी साहब के पास, मल्ली साहब जौ मौसम के प्रोड्युसर हैं, वे लेकर गये थे, कमलेश्वर थे और मेरे सहायक भूषण बनमाली थे। उस वक्त मैं ‘आंधी’ पर काम कर रहा था। मैने सोचा चेन्नई में वहां ढूंढी साहब से मिलना है, वहां से महाबलिपुरम जायेंगे। इस बीच में स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट पूरा कर लूंगा । उस समय ऐसा हुआ कि ढूंढी साहब को कमलेश्वर जी की कहानी पसन्द नहीं आई। कमलेश्वर बहुत बड़े लेखक हैं, साहित्य में उनका बहुत बड़ा मुकाम है। । हम तो उनसे जूनियर हैं । खासतौर पर उस वक्त तो… हमारे लिये बहुत मुश्किल हो गई… कमलेश्वर जी फ़राख़दिल.. वे जानते थे मुझे ‘सारिका’ के दिनों से.. वे मुझे ‘भाई’ कहते थे, मैं...

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