Author: Pavan Jha

होली के रंगों में एक रंग : Holi Mubaarak!

होली के रंगों में एक रंग और : गुलज़ार साब की एक त्रिवेणी जो आज के दैनिक भास्कर के होली विशेष में शामिल हुई है

ज़रा पैलेट सम्भालो रंगोबू का
मैं कैनवास आसमां का खोलता हूं

बनाओ फिर से सूरत आदमी की!

साथ में एक और रंग बोनस में.. ईद के चाँद पर होली का रंग!

जहां नुमा एक होटल है नां…
जहां नुमा के पीछे एक टी.वी. टॉवर है नां…
चाँद को उसके ऊपर चढ़ते देखा था कल!

होली का दिन था
मुंह पर सारे रंग लगे थे
थोड़ी देर में ऊपर चढ़ के
टांग पे टांग जमा के ऐसे बैठ गया था,
होली की खबरों में लोग उसे भी जैसे
अब टी.वी. पर देख रहे होंगे!!

Source : Dainik Bhaskar, March 10, 2009, Page 17 link

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कितनी गिरहें खोली हैं मैने :[Gulzar saab’s Poem on Women’s Day]

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर गुलज़ार साब की एक बेहद संवेदनशील रचना .. कितनी गिरहें खोली हैं मैने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं.. ये रचना गुलज़ार साब ने सबसे पहले जयपुर में सुनाई थी.. और बाद में भुपेन्द्र-मिताली के साथ उनके एलबम “चाँद परोसा है” में मिताली की आवाज़ में प्रस्तुत हुई।

कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

पांव मे पायल, बाहों में कंगन, गले मे हन्सली,
कमरबन्द, छल्ले और बिछुए
नाक कान छिदवाये गये
और ज़ेवर ज़ेवर कहते कहते
रीत रिवाज़ की रस्सियों से मैं जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी…

अब छिलने लगे हैं हाथ पांव,
और कितनी खराशें उभरी हैं
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी रस्सियां उतरी हैं

कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

अंग अंग मेरा रूप रंग
मेरे नक़्श नैन, मेरे भोले बैन
मेरी आवाज़ मे कोयल की तारीफ़ हुई
मेरी ज़ुल्फ़ शाम, मेरी ज़ुल्फ़ रात
ज़ुल्फ़ों में घटा, मेरे लब गुलाब
आँखें शराब
गज़लें और नज़्में कहते कहते
मैं हुस्न और इश्क़ के अफ़सानों में जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी…

मैं पूछूं ज़रा, मैं पूछूं ज़रा
आँखों में शराब दिखी सबको, आकाश नहीं देखा कोई
सावन भादौ तो दिखे मगर, क्या दर्द नहीं देखा कोई
क्या दर्द नहीं देखा कोई

फ़न की झीनी सी चादर में
बुत छीले गये उरियानि के
तागा तागा करके पोशाक उतारी गयी
मेरे जिस्म पे फ़न की मश्क़ हुई
और आर्ट-कला कहते कहते
संगमरमर मे जकड़ी गयी

उफ़्फ़ कितनी तरह मैं पकड़ी गयी…

बतलाए कोई, बतलाए कोई
कितनी गिरहें खोली हैं मैने
कितनी गिरहें अब बाकी हैं

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चख ले, हां चख ले, ये रात शहद है

“जय हो”

जीत का इससे बेहतर उदबोधन क्या होगा!

गुलज़ार साब की जीत, रहमान की जीत, गीत से जुड़े सभी लोगों की जीत, सभी सुनने वालॊं की जीत, हिन्दी फ़िल्म संगीत की जीत

हमें गर्व है गुलज़ार साब और रहमान पर..

आज गुलज़ार साब समारोह में नही थे, मगर ऑस्कर समारोह गुलज़ार हो गया!

जय हो!

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जयपुर हुआ गुलज़ार II

जयपुर प्रवास के दूसरे दिन गुलज़ार साब सुनने वाले काव्य रसिकों से रूबरू हुए एक अनूठे आयोजन में.. श्री पवन के वर्मा के साथ काव्य – जुगलबन्दी प्रस्तुत करते हुए. मौका था जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल का एक सत्र, जहां गुलज़ार साब और श्री वर्मा ने गुलज़ार साब की नज़्मों और त्रिवेणियों को, मिलकर हिन्दोस्तानी और अंग्रेज़ी मे प्रस्तुत कर सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया. सुनने के लिये खचाखच भरे हाल के अन्दर जितने श्रोता थे, उससे ज्यादा बाहर मज़बूरन टी.वी स्क्रीन्स पे मौज़ूद थे..


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जयपुर हुआ गुलज़ार

गुलज़ार साब इन दिनों जयपुर में हैं. अपनी जयपुर यात्रा के पहले दिन आज सुबह आबशार संस्था द्वारा आयोजित पोएट्री वर्कशाप में शिरकत की और नये नौजवान शायरों के कलाम सुने. शाम को अपनी नज़्मों की बौछार से जयपुर के काव्य रसिकों को सराबोर कर दिया.. कल जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल में गुलज़ार साब, श्री पवन वर्मा के साथ नज़्मों की जुगलबंदी पेश करेंगे और २२ तारीख को उनकी नयी किताब “यार जुलाहे” क विमोचन है. इन सभी ही कार्यक्रमॊ के बारे में विस्तार से समय मिलते ही लिखुंगा.. फ़िलहाल आज के कार्यक्रमों की कुछ तस्वीरें पेश हैं

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