Author: Pavan Jha

RoobaRoo 2010 : Gulzarfans Meet Report

स्माल इज़ ब्यूटीफुल
-डॉ. डी.पी. अग्रवाल

बावजूद इस बात के कि मुझे हिंदी समाचार पत्रों में बढ़ते जा रहे अंग्रेजी के प्रयोग से चिढ़ होती है, मैं यहाँ अपनी इस टिप्पणी के लिए अंग्रेजी वाक्यांश का प्रयोग कर रहा हूं। असल में यह वाक्यांश ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ़. शूमाखर की प्रख्यात किताब का शीर्षक है। मुझे लगा कि जो बात मैं कहना चाह रहा हूं, वस इस शीर्षक से ही सबसे बेहतर तरीके से अभिव्यक्त हो रही है, इसलिए न चाहते हुए भी इस शीर्षक का प्रयोग कर लिया है।

जयपुर में इन दिनों पाँचवां जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल चल रहा है, जिसे आयोजकों ने दुनिया का सबसे बड़ा साहित्योत्सव कहा है। यहां सब कुछ बड़ा है, चकाचौंध कर देने वाला, चमत्कृत कर देने वाला। इस साहित्योत्सव पे बहुत कुछ लिखा कहा जा रहा है, और यह स्वाभाविक भी है।

लेकिन इसी के साथ इसी जयपुर में आज सुबह एक छोटा सा आयोजन हुआ, जिसकी कहीं किसी किस्म की कोई चर्चा नहीं हुई। होनी भी नहीं थी। आयोजक चाहते ही नहीं थे। संयोग से मुझे इस आयोजन में उपस्थित रहने का अवसर मिला और मुझे लगा कि श्रेष्ठता, उत्कृष्टता और सार्थकता के लिए बड़ा होना कतई ज़रूरी नहीं है। अगर सही दृष्टि हो तो बहुत छोटा होकर भी सार्थक हुआ जा सकता है और इसीलिए ये शीर्षक…

असल में एक बहुत निजी किस्म का संगठन है, ’गुलज़ार फ़ैन्स क्लब’, जैसा कि नाम से ही जाहिर है यह, शायर गुलज़ार के प्रशंसकों का एक समूह है। इस क्लब ने जयपुर में गुलज़ार साहब के आगमन का लाभ उठाते हुए आज सुब एक अनौपचारिक गोष्ठी का आयोजन लिया और मुझे भी उसमें उपस्थित रहने का अवसर एक मित्र के सौजन्य से मिल गया। वहां जाकर मुझे आश्चर्य हुआ कि पूरे देश के अलग अलग हिस्सों से कोई पचासेक गुलज़ार प्रेमी सिर्फ़ इस गोष्ठी के लिए जयपुर आए थे। कोई मुंबई से, कोई पुणे से, कोई अहमदाबाद से, कोई दिल्ली से, और ना जाने कहां कहां से, सिर्फ़ इस मक़सद के साथ कि कुछ वक्त गुलज़ार साहब के सानिध्य में बिताया जाए, इनके अलावा बहुत थोड़े से हम स्थानीय लोग और थे, कुछ संगीत प्रेमी, कुछ और।

गुलज़ार साहब ने इस गोष्ठी के लिए ये सुझाया था कि बजाय इसके कि सिर्फ़ वे ही बोलें, क्यॊं ना कुछ युवा अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ करें! और यही हुआ भी, कोई पन्द्रह युवाओं ने अपनी लिखी कविताएं पढ़ीं खास बात यह कि इनमें से अधिकांश तकनीक से जुड़े और अपनी अपनी ज़िन्दगियों में सुस्थापित युवा थे। यानि ये आम हिंदी कवि से भिन्न लगे थे और इसलिए इनकी कविताओं का मुहावरा भी आम हिंदी कविता से भिन्न था।
जिन लोगों ने वहां अपनी कविताएं पढ़ीं उनमें मेरा जाना-पहचान सिर्फ़ एक नाम था – जयपुर के युवा कवि प्रभात का, शेष सब कविता की दुनिया के नवजात थे, लेकिन उनकी रचनाएं सुनते हुए सबसे प्रीतिकर प्रतीति तब हुई कि साहित्य और विशेषकर कविता के प्रति रुझान और अनुराग अभी भी शेष है, इस प्रतीति का महत्व इस बात से और बढ़ जाता है कि हम लोग अक्सर इस बात का शोक मनाया करते हैं कि हिंदी में रचनाकारों की नई पीढ़ी विरल होती जा रही है। यानि लोग कविताएं पढ़ भी रहे हैं, लिख भी रहे हैं। मेरे खयाल से इस बात से कोई फ़र्क नहीं पढ़ना चाहिये कि इन कवियों में से कुछेक पर गुलज़ार शैली की छाप काफ़ी गहरी थी। जैसे जैसे ये लोग और अधिक लिखेंगें पढ़ेंगे, इनकी अपनी शैली विकसित होगी, कलाओं की दुनिया में शुरु शुरु में अपने आदर्श का अनुकरण आम बात है।

इन कवियों के काव्य-पाठ के बाद हामरे शह्र के कुछ जाने पहचाने शायरों फ़ारूक इंजीनियर, आदिल मंसूरी और शीन काफ़ निज़ाम ने भी कुछ रचनाएं पढ़ीं, और फिर गुलज़ार ने अपनी कुछ बहुत गंभीर कविताएं सुनाईं।

और इसके बाद चला चर्चाओं का दौर, उप्सथित युवाओं ने कुछेक सवाल फ़िल्मों मे कविता की स्थिति, समय के साथ कविता में आ रहे परिवर्तनों, हिंदी और उर्दू के अंतरसंबंधो आदि पर किए, जिनके उत्तर गुलज़ार ने बहुत ही सुलझे हुए अंदाज़ में दिए, उनला कहना था कि अगर कविता समय के साथ नहीं बदलेगी, अगर उसकी भाष और बिंब विधान में कोई बदलाव नहीं हुआ तो वह जड़ हो जाएगी। लिपि के मुद्दे पर उनका स्पष्ट मत था कि इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि किसी भाषा को किसी दूसरी लिपि में लिखा या पढ़ा जाए। देवनागरी में भी ग़ालिब, ग़ालिब ही रहेंगे।

सभी उपस्थित लोग ये चाहते थे कि गुलज़ार उनके बीच में रहें, उनसे और बतियाया जाए, उनसे और रचनाएं सुनी जाएं’ लेकिन उन्हें दोपहर की फ़्लाइट पकड़नी थी, इसलिए अतृप्ति सभी के मन में बनी रही। मुझे ये छोटा सा अनौपचारिक आयोजन ब्यूटीफुल इस कारण से लगा कि एक तो इससे मेरा ये भ्रम टूटा कि हमारे समाज में साहित्य का स्थान कम होता जा रहा है और विशेषरूप से तकनीकवालों का तो साहित्य से कोई लेना देना ही नहीं, दूसरी बात यह कि कोई कार्यक्रम छोटा होकर भी बहुत सार्थक हो सकता है, बशर्ते आयोजकों के पास सही दृष्टि हो, उनकी नीयत में खोट ना हो और साहित्यकार भी अपनी ओढ़ी हुई गम्भीरता को उतार फेंकने को तैयार हो। हम अपने साहित्यकारों को जिस भंगिमा में देखने के आदी हैं, वह उनके प्रति सम्मान कम और वितृष्णा ज्यादा होती है। उसके विपरीत गुलज़ार यहां अपने सही और मानवीय रूप में थे। ठीक उसी तरह जैसे हमारे घर का कोई बड़ा होता है। इसलिए उनसे सही संवाद स्थापित हो सका और इसीलिए मैनें एक छोटे से अप्रचारित कार्यक्रम पर अपनी टिपाणी के लिए अर्थशास्त्री शूमाखर से उनकी किताब का शीर्षक उधार लिया।

साभार : मार्निंग न्यूज़ (24.01.10)

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Jugalbandi gulzar – jagjit singh in hyderabad [जुगलबन्दी – गुलज़ार-जगजीत सिंह, हैदराबाद में]

अक्तूबर 11, 2009 (October 11, 2009)

वो शाम बहुत हसीन थी! (report by K Venkat)

हैदराबादी नवाबों के चौमोहोल्ला पैलेस में, खुले आसमां के नीछे, जहां जगजीत सिंह की आवाज़ हवा में सराबोर हुई, वहीं गुलज़ार साब ने अपनी चन्द नज़्मों से ज़िन्दगी के कुछ नये “इमजेस” बना दिये. यूं तो बहुत बार, कई शहरों में जगजीत जी को सुना, मगर कल महफ़िल कुछ और ही रंग में थी. रात तो हर रोज़ होती थी मगर, इस बार, चांद भी था.

गुलज़ार साब और जगजीत जी एक बग्घी में बैठ कर मन्च के पास पधारे, और आते ही दोनों को गुल-पोशी की गयी. फिर जगजीत जी ने महफ़िल की शुरुआत अपनी ग़ज़लों से की. तकरीबन एक घन्टे बाद, जब तक हम बेसब्र हो चले थे, गुलज़ार साब को जगजीत जी ने मन्च पर बुलाया और उनका परिचय भी अपने ही अन्दाज़ में किया “गुलज़ार साब ’मल्टी फ़ेसेटेड पर्सनैलिटि हैं मगर इनके पास एक ही ड्रैस है… (गुलज़ार साब अपने ट्रेडमार्क सफ़ेद लिबास में थे) …ये प्रोड्य़ुसर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट राईटर, डायलोग राईटर, लिरिसिस्ट हैं और आज हमारी खुशकिस्मति हैं की वो हमारे बीच कुछ नज़्में लेकर आये हैं”

फिर गुलज़ार साब ने शुरुआत की, के किस तरह ज़िंदगी एक ’हिरन’ की तरह है जिसके पीछे हम भाग रहें हैं और आखिर में ये समझ नहीं आता के कौन किसके पीछे भाग रहा है. फिर हैदराबाद को सलाम करते हुए उन्होने उर्दू ज़बान पे एक नज़्म कही जो मेरे खयाल से, हर उस शख़्स को सुननी चाहिये, जिसे ईश्वर ने बोलने की शक्ति दी हो. फिर बात चली आज के दौर की जहां सब कुछ कम्प्युटराईज़्ड हो गया है और हुम किताबों से किस तरह दूर हो चले हैं. उन्होने कई नज़्मों में अंग्रेज़ी अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल किया मगर जगजीत जी को एक तसल्ली भी दिलायी – “जगजीत मैं अंग्रेज़ी का इस्तेमाल गज़लों में नहीं करूंगा. मगर नज़्म में आज कल के इन नये लफ़्ज़ों का इस्तेमल जायज़ है. अब मैं ‘कम्प्यूटर’ को कुछ और तो नहीं कह सकता”. ज़िंदगी के कुछ इमजेस की पोएटिक स्केचेस खींचे, एक नज़्म उम्र के नज़रिये पे पढ़ि (‘अब मैं मकान के ऊपरी मन्ज़िल पे रहता हूं’) और एक नज़्म पाकिस्तान और अपने बीच चल रहे उथल-पुथल के बारे में थी.

आखिर में गुलज़ार साब ने जगजीत जी के बारे में कहा “जगजीत की आवाज़ में सुन कर मुझे मेरे ही लिखी हुई गज़लें, और बेहतर लगने लगती हैं. जगजीत जिस तरह गज़ल को समझ्ते हैं.. किस लफ़्ज़ पे कितना वज़न देना चाहिये और कैसे मनी को उभारना चाहिये, ये उनसे बेहतर कोई और नहीं जानता. ये मैनें पहले भी कहा था, और अब भी कह रहा हूं, “ग़ालिब की आवाज़ – जगजीत हैं” ये कहते हुए ग़ालिब का इन्ट्रोडक्शन “बल्लिमारा के मोहल्ले” नज़्म को पढ़ कर कराया. उन्होने साथ में जगजीत जी से ये इल्तेज़ा भी की “जगजीत जब मैन मन्च से उतरूं और दूसरे हाफ़ की जब शुरुआत करो तो ये मेरी गुज़ारिश है, की वो, ग़ालिब के ग़ज़ल से हो. ये कह कर जब गुलज़ार साब मन्च से उतरे तो जगजीत ने समा की कैफ़ियत को खूब समझ कर सुना दिया “हज़ारों ख्वाहिशैं ऐसीं”

कैमरा नहीं लेकर गया था मगर सैल-फ़ोन से दो-तीन तस्वीरें ली हैं और गुलज़ार साब के सभी नज़्म रिकार्ड भी कर लिये हैं. मगर अभी तक मौका नहीं मिला की उन्हें लैप्टॉप में ट्रान्सफ़र करके आपतक भेज सकूं. अगर रिकार्डिंग क्वालिटी खराब रही तो ये कोशिश ज़रूर रहेगी की सारे नज़्म इन्ग्लिश स्क्रिप्ट लिख कर आपके साथ शेयर करूं.

जय हो!

-वैंकट (हैदराबाद से)

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Thanks for all the love, respect and birthday wishes!

Gulzar saab has conveyed thanks to everyone for sending birthday wishes last week. In a specially recorded message like every year (though recording is not that great as the phone I used played foul) he has thanked every one for the love, respect and affection of his fans.. He has also recorded a special nazm (roman transliteration below)



पवन, बहुत बहुत शुक्रिया,
क्यूंकि तुम्हारी वजह से, हज़ारों चाहने वालों से राब्ता पैदा होता है, मेरा उनसे ताल्लुक रहता है
उनसे ‘कॉंटेक्ट’ (contact) होता रहता है.. और सिर्फ़ अपने मुल्क में ही नहीं, हिन्दुस्तान में ही नहीं, हिंदुस्तान के बाहर से भी जो ’मैसेज’ मिलते हैं, जगह जगह से संदेसे मिलते है मुझे मुबारक़बाद के.. यकीन मानो आई गेट ओवरव्हेल्मेड (I get overwhelmed)… छलकने लगता हूं अन्दर से.. और इतनी इज़्ज़त देते हैं, सम्मान देते हैं दोस्त, चाहने वाले!

और सबका शुक्रिया एक एक को अकेले अकेले कर दूं ये मुमकिन नहीं होता तो इसलिये तुम्हारे थ्रू (through) ये आवाज़ उन तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं.. अब.. मशक़ूर बड़ा मामूली सा लफ़्ज़ है कि मैं बड़ा मशक़ूर हूं, बहुत थैन्क्फ़ुल (thankful) हूं, लेकिन उसके बगैर गुज़ारा भी नहीं.. लेकिन इससे मैं बहुत ज्यादा कुछ हूं.. अब शुकराने में कहिये या इस इज़्ज़त से, सम्मान से सर वाकई में झुक जाता है कि इतना प्यार भी मिल सकता है.. अब हरकतें मेरी क्या हैं वो आप लोग मुझसे बेहतर जानते हैं.. लेकिन लगा ज़रूर रहता हूं कुछ ना कुछ हरकतें ऐसी करने में.. और हर साल की तरह एक बार फिर आप तमाम तमाम तमाम चाहने वालों को मेरा बहुत बहुत शुक्रिया.. आपके ख़त मिलते हैं, और बड़े अच्छे, प्यारे प्यारे से ख़त मिलते हैं, बड़े पर्सनल से मिलते हैं

एक काम और किया करता हूं जन्म दिन पर कोशिश करता हूं, कोई न कोई एक नज़्म आप लोगों के लिए पेश कर सकूं.. अगर नीयत हो तो सुन लीजिये.. चलिये एक नज़्म..

“भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है!
इसी स्टेशन पे ले आती है ये हर साल मुझको
और रोकती भी नहीं है
जहां जन्म की तारीख़ लिखी है

भंवर के दायरे गर फैल रहे हैं
तो फिर साहिल कहाँ हैं
सिमटता जा रहा है दायरा तो फिर
उम्र का मरकज़ कहाँ पर है

भंवर सी घूमती है ये ज़मीं, रोको
उतर के पूछ लूं आखिर मुझे जाना कहाँ तक है”

बहुत बहुत शुक्रिया!

you can listen the audio message at
http://www.gulzaronline.com/thanks09/gthanks09.htm

in Roman,

pavan, bahut bahut shukriyaa,
kyU.nki tumhaarI vajah se, hazaaro.n chaahane waalo.n se raabtaa paidaa hotaa hai, meraa unase taalluk rahataa hai
unase contact hotaa rahataa hai.. aur sirf apane mulk me.n hI nahI.n, hindustaan me.n hI nahI.n, hi.ndustaan ke baahar se bhI jo messages milate hai.n, jagah jagah se sa.ndese milate hai mujhe mubaarakbaad ke.. yakeen maano I get overwhelmed… Chalakane lagataa hU.n andar se.. aur itanI izzat dete hai.n, sammaan dete hai.n dost, chaahane waale!

aur sabakaa shukriyaa ek ek ko akele akele kar dU.n ye mumakin nahI.n hotaa to isaliye tumhaare through ye aavaaz un tak pahu.nchaane kI koshish karataa hU.n.. ab.. mashak.oor baD.aa maamUlI saa lafz hai ki mai.n baD.aa mashak.oor hU.n, bahut thankful hU.n, lekin usake bagair guzaaraa bhI nahI.n.. lekin isase mai.n bahut jyaadaa kuCh hU.n.. ab shukaraane me.n kahiye yaa is izzat se, sammaan se sar vaakaI me.n jhuk jaataa hai ki itanaa pyaar bhI mil sakataa hai.. ab harakate.n merI kyaa hai.n vo aap log mujhase behatar jaanate hai.n.. lekin lagaa zarUr rahataa hU.n kuCh naa kuCh harakate.n aisI karane me.n.. aur har saal kI tarah ek baar phir aap tamaam tamaam tamaam chaahane waalo.n ko meraa bahut bahut shukriyaa..
aapake kh.at milate hai.n, aur baD.e achChe, pyaare pyaare se kh.at milate hai.n, baD.e parsanal se milate hai.n

ek kaam aur kiyaa karataa hU.n janm din par koshish karataa hU.n, koI na koI ek nazm aap logo.n ke lie pesh kar sakU.n.. agar nIyat ho to sun lIjiye.. chaliye ek nazm..

“bha.nvar sI ghUmatI hai ye zamI.n, roko
bha.nvar sI ghUmatI hai ye zamI.n, roko
utar ke pUCh lU.n aakhir mujhe jaanaa kahaa~.n tak hai!
isI sTeshan pe le aatI hai ye har saal mujhako
aur rokatI bhI nahI.n hai
jahaa.n janm kI taarIkh. likhI hai

bha.nvar ke daayare gar phail rahe hai.n
to phir saahil kahaa~.n hai.n
simaTataa jaa rahaa hai daayaraa to phir
umra kaa marakaz kahaa~.n par hai

bha.nvar sI ghUmatI hai ye zamI.n, roko
utar ke pUCh lU.n aakhir mujhe jaanaa kahaa~.n tak hai”

bahut bahut shukriyaa!

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रीढ़ – Reedh – One of the most inspiring poems. Kusumagraj Translated by Gulzar

Translation of Kusumagraj‘s one of the most inspiring poems (Reedh – Original Title Kanaa in Marathi). Very Simply told but exceptional in impact.. Conversation of a student with his old time teacher after long time.. (for roman, scroll down)

रीढ़

“सर, मुझे पहचाना क्या?”
बारिश में कोई आ गया
कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए

पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर

“गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर
कुटिया में रह कर गईं!
माइके आई हुई लड़की की मानिन्द
चारों दीवारों पर नाची
खाली हाथ अब जाती कैसे?
खैर से, पत्नी बची है
दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा,
जो था, नहीं था, सब गया!

“’प्रसाद में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के!
मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं
मिट्टी कीचड़ फेंक कर,
दीवार उठा कर आ रहा हूं!”

जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो…

’न न’, न पैसे नहीं सर,
यूंही अकेला लग रहा था
घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी…
हाथ रखिये पीठ पर और इतना कहिये कि लड़ो… बस!”

Reedh (Original Title Kanaa)
Original Marathi Poem : Kusumagraj
Translated by Gulzar


Reedh
:

“Sir, Mujhe Pehchaana kya?”
Baarish me koi aa gaya
kapade the muchade hue
aur baal sab bheege hue

pal ko baitha, phir hansaa aur bola oopar dekh kar

“gangaa maiyya aaI thi, mehmaan hokar
kutiyaa me rah ke gaI|
maaike aai huee ladaki ki maanind
chaaron deewaro par naachi
khaali haath ab jaato kaise?
khair se, patni bachi hai
deewaar chooraa ho gaI, chulha bujha
jo tha, nahin tha, sab gaya!

“prasaad me palako ke neeche chaar katare rakh gaI hai paani ke
meri aurat aur mai.n laD rahe hai
mitti keechad phenk kar
deewaar uthaa kar aa rahaa hoon!”

jeb ki jaanib gayaa tha haath, ki hans kar uthaa wo…

‘na, na, na paise nahi.n sir,
yunhi akela lag rahaa tha..
ghar to TuTa, reedh ki haddi nahi.n TuTi meri
haath rakhiye peeth par, aur itna kahiye ki
laDo…bas!…

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चौपाल में गुलज़ार साब की ऑस्कर जीत का जश्न [Oscar Victory Celebrations at Chaupal]

रविवार 12 अप्रैल, स्थान-राजेन्द्र गुप्ता जी की बगीची, चौपाल फिर से जमी. मगर इस बार बहुत ही खास मक़सद के साथ. गुलज़ार साब की ऑस्कर जीत का जश्न मनाने और गुलज़ार साब को इस उपलब्धि के लिये सम्मानित करने के लिये. और जब गुलज़ार साब आमंत्रित हों तो चौपाली रसिकों का एक मक़सद अपने आप जुड़ जाता है, उनको जी भर के सुनने का । तो साहेबान महफ़िल जमी और क्या खूब जमी। मुम्बई की उमस भरी गर्मी को मात देते हुए पसीने से तरबतर 150 के ऊपर, चौपाली रसिक सुरों और कविताओं की बौछार से 5 घंटे तक सराबोर होते रहे।

महफ़िल की शुरुआत हुई गज़ल गायिका सीमा सहगल के गायन से जिन्होने गुलज़ार साब के शब्दों (यार जुलाहे) को धुन और आवाज़ में बांध कर प्रस्तुत किया। जावेद सिद्दिकी साब, अपनी बेटी लुबना, दामाद सलीम आरिफ़ और नातियों फ़राज़ और फ़ैज़ी(तहरीर में ईदगाह का हामिद) के साथ प्रस्तुत थे और तीनों पीढियों ने गुलज़ार साब को अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किया.. जावेद साब ने गुलज़ार साब के बहुआयामी व्यक्तित्व के कुछ जाने और कुछ अनजाने पहलुओं का जिक्र किया। लुबना और सलीम की जोड़ी ने गुलज़ार साब द्वारा लिखित नाटक “खराशें” के कुछ अंश प्रस्तुत किये वहीं फ़ैज़ी ने बच्चों की कविता से बहुत तालियां बटोरी।

साहित्यकार विश्वनाथ सचदेव ने गुलज़ार साब के साथ बांटे गये मज़ेदार लम्हों की याद ताज़ा की । पूना से आये फ़िल्म इन्स्टीट्यूट FTII के निदेशक (धुनों की यात्रा के लेखक) पंकज राग ने अपनी किताब से कुछ अंश पढ़ कर सुनाये। किशोर कदम (सौमित्र) ने गुलज़ार साब की डायरी का काव्य पाठ किया तो शेखर सेन ने उनके कुछ फ़िल्मी गीत सुनाये । हास्य और व्यंग के एक वर्तमान हस्ताक्षर सुभाष काबरा ने अपने गुलज़ार साब पे केन्द्रित एक मज़ेदार व्यंग पाठ “हाय, हम गुलज़ार ना हुए” से चौपाल की सभा को एक नया माहौल दिया । फिर बारी थी स्टेज पे आने की भूपेन्द्र की और शुरुआत की उन्होने “थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा आसमां” के साथ और उनके गाते गाते शब्द भूलने का पुरुस्कार श्रोताओं को मिला एक अनूठी जुगलबन्दी के साथ, भुपेन्द्र और विशाल भारद्वाज के साथ… दर-असल भूपी जी को, विशाल श्रोताओं के बीच में से बार बार सही शब्द याद दिला रहे थे… गुलज़ार साब ने विशाल को स्टेज पे धकेल दिया और विशाल और भूपी जी ने “बादलों से काट काट कर” और “तेरे जाने से कुछ बदला नहीं” को जुगलबंदी में पेश कर सबका मज़ा दोगुना कर दिया।

इनके गायन के बाद वो पल आया, जिसके लिये ये महफ़िल सजाई गई। कार्यक्रम का संचालन कर रहे चौपाल के “एंकर” अतुल तिवारी ने गुलज़ार साब को सम्मानित करने के लिये मंच पे आमंत्रित किया पुष्पा भारती जी (स्व. धर्मवीर भारती की पत्नी) को । पुष्पा जी ने गुलज़ार साब को ट्रॉफ़ी प्रदान कर सम्मानित किया और चौपाल के इतिहास में एक यादगार पल की प्रविष्टी कर दी ।

अशोक बिन्दल (जिनको ट्रॉफ़ी की खूबसूरती का श्रेय भी जाना चाहिये) ने गुलज़ार साब को अपनी कविता “ठहरी हुई आवाज़” समर्पित की। ट्रॉफ़ी पर पवन की ऑस्कर जीत की एक त्रिवेणी अंकित थी, जिसको मंच पे पढ़ा गया।


“ये सोना जो इतना चमक रहा है
अपनी किस्मत पे इतरा रहा है शायद!

तेरे नूर के आगे फिर भी फीका है।”

चित्रकार चरण शर्मा ने गौतम बुद्ध पर बनाई एक विशेष पेंटिंग और उनकी पुस्तक गुलज़ार साब को प्रस्तुत की।

गुलज़ार साब ने चौपाल परिवार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि चौपाल उनका परिवार है और ऑस्कार से ज्यादा खुशी इस बात से है कि उनका चौपाल जैसा परिवार है ।

पुष्पा जी ने धर्मवीर भारती जी का गुलज़ार साब पे कई वर्षों पहले लिखा एक लेख पढ़ कर प्रस्तुत किया।

और बारी आई गुलज़ार साब के काव्य-पाठ की, और अगले एक घंटे तक अपनी नज़्मों की बौछार से गुलज़ार साब ने श्रोताओं को सराबोर कर दिया। एक के बाद एक नज़्मों की बौछार चली जिनमें “खुदा”, “कितनी गिरहें”, “पूरे का पूरा आकाश”, “चिपचिपे दूध से नहलाते”, और “सिद्दार्थ” शामिल थी।

बारिश थमी भी ना थी कि रेखा भारद्वाज, जिनके गायन की बहुत पब्लिक डिमांड थी, ने “इश्क़ा इश्क़ा” से “तेरे इश्क़ में” और “तेरी रज़ा” सुना कर श्चौपाल के रसिकों को वाह वाह कहने पे मज़बूर कर दिया। कार्यक्रम के अंत में प्रस्तुति दी अनिल-सीमा सहगल की बेटी पार्वती ने, जिसने गुलज़ार साब की नज़्म को अपनी धुन के साथ प्रस्तुत किया। 5 घंटे के बाद भी किसी की इच्छा नहीं थी कि ये यादगार शाम कभी खत्म हो।

कुछ तस्वीरें पेश हैं (अशोक बिन्दल, मोहित कटारिया, भीम सिंह, अंशुल चौबे और प्रेरक व्यास के सहयोग से) :

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ऑस्कर पहुंचा बोस्किआना (Oscar Arrived at Boskyana)

गुलज़ार साब ऑस्कर समारोह में नहीं जा पाये मगर अब परम्परा के मुताबिक गुलज़ार साब की ऑस्कर ट्रॉफी सोमवार को उनके घर बोस्किआना पहुंच गई है ।

Picture Courtesy : Meghna Gulzar
[साभार : मेघना गुलज़ार – ऑस्कर के आगमन पर ये खूबसूरत तस्वीर बिटिया मेघना के द्वारा ली गई है । शुक्रिया मेघना! इस लम्हे को हम सब के साथ बांटने के लिये]

बोस्किआना में पहले ही ट्रॉफियों का इक भरा पूरा परिवार, अपने इस नवीनतम सदस्य के लिये जगह बनाने में लग गया है!

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